जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
Jaise suraj ki garmi se kalte huye tan ko
जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाए तरुवर की छाया ऐसी ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया मेरे राम
१....भटका हुआ मेरा मन था कहीं मिल ना रहा था सहारा लहरों से लड़ती हुई नाव को जैसे मिल न रहा हो किनारा उस लड़खड़ा ती हुई नाव को जो किसी ने किनारा दिखाया ऐसे ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया मेरे राम
२...शीतल बनी आग चंदन के जैसी राघव कृपा हो जो तेरी ऊंजीयाली पूनम की हो जाएं रातें जो थी अमावस अंधेरी युग युग से प्यासी मरूभूमि ने जैसे सावन का संदेश पाया ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया मेरे राम
३...जिस राह की मंजिल तेरा मिलन हो उस पर कदम मैं बढाऊॅ फूलों में कांटो में पतझड़ बहारों में मैं ना कभी डगमगाऊॅ पानी के प्यासे को तकदीर ने जैसे जी भर के अमृत पिलाया ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया मेरे राम
जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाए तरुवर की छाया ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया मेरे राम
श्रेणी:
राम भजन
स्वर:
Shakti Sethi ji