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कबीर के दोहे

Kabir ke dohe

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताएं कबीरा गोविंद दियो बताए
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर कबीरा फल लागे अति दूर
ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय कबीरा आपहु शीतल होय
बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय जो मन खोजा आपना मुझसे बुरा ना कोई कबीरा मुझसे बुरा ना कोई
माटी कहे कुम्हार से तु क्या रौंदे मोय 1 दिन ऐसा आएगा मैं रो दूंगी तोय कबीरा मैं रो दूंगी तो है
काल करे सो आज कर आज करे सो अब पल में प्रलय होएगी बहुरि करेगा कब कबीरा बहुरि करेगा कब
माया मरी न मन मरा मर मर गया शरीर आशा तृष्णा ना मरी कह गए दास कबीर रे बंधु कह गए दास कबीर
दुख में सुमिरन सब करे सुख में करे न कोई जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होय कबीरा दुख काहे को होय

श्रेणी:

विविध भजन

स्वर:

मीनू सेठी जी

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